भोंपूराम खबरी।
हिंदू धर्म में नवरात्र का विशेष महत्व माना गया है और इस दौरान 9 दिनों तक मां दुर्गा के स्वरूपों का पूजन किया जाता है. पंचांग के अनुसार 19 मार्च से चैत्र नवरात्र से आरंभ हो चुके हैं और 21 मार्च को नवरात्र का तीसरा दिन है. नवरात्र का तीसरा दिन मां दुर्गा के चंद्रघंटा स्वरूप का पूजन किया जाता है. मां चंद्रघंटा को मां पार्वती का ही विवाहित स्वरूप माना गया है और कहते हैं कि उनका पूजन करने से भक्तों को सभी कष्टों से मुक्ति मिलती है. साथ ही मां चंद्रघंटा की उपासना करने से भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूरी होती है. आइए जानते हैं मां चंद्रघंटा की पूजा विधि, मंत्र और आरती
मां चंद्रघंटा का स्वरूप
शास्त्रों के अनुसार मां चंद्रघंटा की सवारी बाघ है और मां ने अपने मस्तक पर अर्ध चंद्रमा धारण किया हुआ है. माता की 10 भुजाएं हैं, जिनमें बाएं भुजाओं में माता त्रिशूल, गधा, तलवार, कमंडल और वर मुद्रा धारण करती हैं और बाएं भुजाओं में कमल, पुष्प, तीर, धनुष, जप माला और अभय मुद्रा धारण करती हैं. देवी चंद्रघंटा का स्वरूप भक्तों के कल्याण करने वाला और शांतिपूर्ण है. साथ ही वह सभी अस्त्र और शास्त्रों से सुसज्जित हैं और युद्ध के लिए तत्पर रहती हैं. देवी चंद्रघंटा के मस्तक पर विद्यमान चंद्र-घंटी को भक्तों की रक्षा का प्रतीक माना जाता है.
मां चंद्रघंटा की पूजा विधि
नवरात्र के तीसरे दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान आदि करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करें. इसके बाद मंदिर में माता रानी के सामने देसी घी का दीपक जलाएं और मन ही मन उनके चंद्रघंटा स्वरूप का ध्यान करें. इसके बाद माता रानी को फल, फूल अर्पित करें और खीर का भोग लगाएं. इसके बाद मां दुर्गा की आरती करें और दुर्गा सप्तशती का पाठ करें. साथ ही मां चंद्रघंटा के मंत्रों का जाप करें.
मां चंद्रघंटा के मंत्र
ॐ देवी चन्द्रघण्टायै नमः..
पिण्डज प्रवरारूढा चण्डकोपास्त्रकैर्युता. प्रसादं तनुते मह्यम् चन्द्रघण्टेति विश्रुता..
या देवी सर्वभूतेषु माँ चन्द्रघण्टा रूपेण संस्थिता. नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः..
मां चंद्रघंटा की आरती
जय मां चंद्रघंटा सुख धाम
पूर्ण कीजो मेरे काम,
चंद्र समान तू शीतल दाती
चंद्र तेज किरणों में समाती,
क्रोध को शांत बनाने वाली
मीठे बोल सिखाने वाली,
मन की मालक मन भाती हो
चंद्र घंटा तुम वरदाती हो,
सुंदर भाव को लाने वाली
हर संकट मे बचाने वाली,
हर बुधवार जो तुझे ध्याये
श्रद्धा सहित जो विनय सुनाय,
मूर्ति चंद्र आकार बनाएं
सन्मुख घी की ज्योत जलाएं,
शीश झुका कहे मन की बाता
पूर्ण आस करो जगदाता,
कांची पुर स्थान तुम्हारा
करनाटिका में मान तुम्हारा,
नाम तेरा रटू महारानी
‘भक्त’ की रक्षा करो भवानी!




