भोंपूराम खबरी,देहरादून। उत्तराखंड की जीडीपी पिछले चार वर्षों में डेढ़ गुनी होने एवं प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि होने की खुमारी खत्म होने से पहले ही राज्य के बिजली महकमे ने आम लोगों को महंगी बिजली का झटका दे दिया है। खास बात तो यह है कि बिजली की दरों में 34 पैसे से लेकर 1-44 रुपए की यह वृद्धि विद्युत खरीद के मासिक समायोजन(एफपीपीसीए) के नाम पर की गई है, जबकि वार्षिक संयोजन समायोजन किया जाना अभी प्रस्तावित है।
जाहिर है कि अगर वार्षिक समायोजन के नाम पर भी बिजली महकमे द्वारा बिजली की दलों में वृद्धि कर दी गई ,तो बिजली का बिल गर्मी आने से पहले ही उपभोक्ताओं के पसीने छुड़ाने लगेगा। उल्लेखनीय है कि बिजली खरीद लागत समायोजन (एफपी पीसीए) के तहत बिजली की दरों में 34 पैसे से लेकर 1-44 रुपये प्रति यूनिट तक कि यह बढ़ोतरी मुख्य अभियंता (वाणिज्य) एन।एस। बिष्ट द्वारा जारी आदेश के साथ ही तत्काल प्रभाव से लागू हो गई है। यूपीसीएल के इस फैसले से राज्य के घरेलू, व्यावसायिक और औद्योगिक समेत लाखों उपभोक्ता तो प्रभावित होंगे ही, साथ ही साथ उद्योग और कारोबार पर इसका अच्छा खासा असर पड़ेगा, क्योंकि नई दरों के अनुसार व्यावसायिक श्रेणी के उपभोक्ताओं के लिए बिजली 1-34 रुपये प्रति यूनिट महंगी हो जाएगी। जबकि औद्योगिक इकाइयों के लिए बिजली की बढ़ी हुई दर 1-24 रुपये प्रति यूनिट होगी ,वहीं अस्थायी कनेक्शन लेने वाले उपभोक्ताओं के लिए बिजली की बड़ी हुई दर 1-44 रुपये प्रति यूनिट निर्धारित की गई है। बिजली की कीमत में बढ़ोतरी से गरीब परिवारों को भी राहत नहीं मिली है। गरीबी रेखा से नीचे (बीपीएल) श्रेणी के उपभोक्ताओं के लिए भी बिजली 34 पैसे प्रति यूनिट महंगी कर दी गई है। बिजली दरों में हो रही लगातार बढ़ोतरी को लेकर उद्योग जगत ने अब अपना विरोध जताना आरंभ कर दिया है। स्टील निर्माता संघ के उपाध्यक्ष पवन अग्रवाल का कहना है कि हर महीने बिजली दरें बढ़ाना उद्योगों को हतोत्साहित करने वाला कदम है। उनका तर्क है कि जब सालाना दरों में वृद्धि पहले ही की जाती है, तो हर महीने अतिरिक्त बढ़ोतरी का कोई औचित्य नहीं बनता। उनके अनुसार बढ़ते बिजली बिलों से उत्पादन लागत बढ़ रही है, जिससे बाजार में प्रतिस्पर्धा करना बेहद कठिन होता जा रहा है।
उधर ऊर्जा निगम के अधिकारियों का कहना है कि बिजली खरीद की लागत में लगातार उतार-चढ़ाव होता रहता है। इसी कारण ईंधन अधिभार समायोजन के माध्यम से हर महीने दरों में बदलाव करना पड़ता है। ऊर्जा निगम के अधिकारियों के उपरोक्त तर्क आम उपभोक्ताओं और व्यापारियों के गले नहीं उतर रहे और उनमें इस फैसले को लेकर भारी असंतोष देखा जा रहा है ।दूसरी तरफ अप्रैल में प्रस्तावित वार्षिक बिजली दरों में संभावित बढ़ोतरी की चर्चा ने आम लोगों की चिंता और बढ़ा दी है।




