
भोंपूराम खबरी। भारत में आम उपभोक्ताओं के मासिक बजट पर एक बार फिर बड़ा बोझ बढ़ने जा रहा है। पेट्रोल और डीजल की आसमान छूती कीमतों से पहले ही परेशान जनता के लिए अब अपनी जेब में रहने वाले मोबाइल फोन को चालू रखना भी खासा महंगा सौदा होने वाला है। देश की शीर्ष प्राइवेट टेलीकॉम कंपनियां अपने विभिन्न रिचार्ज प्लान्स की कीमतों में पंद्रह से लेकर बीस प्रतिशत तक की भारी बढ़ोतरी करने जा रही हैं। इस बड़े बदलाव के बाद एक आम मध्यमवर्गीय परिवार का सालाना मोबाइल खर्च काफी बढ़ जाएगा। इस बार की बढ़ोतरी में एक खास पैटर्न यह भी देखा जा रहा है कि कंपनियां सीधे तौर पर दाम बढ़ाने के साथ-साथ चुपचाप तरीके से प्लान्स की वैलिडिटी यानी दिनों की संख्या को भी कम कर रही हैं। इसके चलते उपभोक्ताओं को कम समय के लिए पहले से अधिक पैसे चुकाने पड़ रहे हैं। इस वित्तीय बदलाव के पीछे मुख्य वजह यह है कि कंपनियों ने देश भर में 5G नेटवर्क का इंफ्रास्ट्रक्चर खड़ा करने के लिए भारी निवेश किया है। अब कंपनियां अपने प्रति यूजर औसत राजस्व को मजबूत करने के लिए इस निवेश की वसूली आम जनता की जेब से कर रही हैं, जिसके चलते फ्री अनलिमिटेड डेटा का दौर अब पूरी तरह खत्म होने की कगार पर है।

स्पीड और नेटवर्क प्रायोरिटी के नए खेल से बदलेगा डिजिटल सफर
रिचार्ज के दाम बढ़ाने के अलावा टेलीकॉम कंपनियां एक और बड़े रणनीतिक बदलाव की तरफ कदम बढ़ा चुकी हैं, जो आने वाले समय में इंटरनेट इस्तेमाल करने के पूरे तौर-तरीके को बदलकर रख देगा। कंपनियां अब एक ऐसी व्यवस्था पर काम कर रही हैं जहां सिर्फ ज्यादा डेटा के लिए नहीं, बल्कि बेहतर और सुपरफास्ट इंटरनेट स्पीड के लिए पैसे वसूले जाएंगे। इस अत्याधुनिक तकनीक को तकनीकी दुनिया में नेटवर्क स्लाइसिंग कहा जाता है। इसके तहत एक ही मुख्य 5G नेटवर्क के भीतर वर्चुअल तौर पर अलग-अलग डिजिटल रास्ते या लेन तैयार कर दिए जाते हैं। जो उपभोक्ता प्रीमियम या महंगे प्लान का चुनाव करेंगे, उन्हें नेटवर्क पर विशेष प्राथमिकता दी जाएगी। इसका सीधा मतलब यह है कि किसी अत्यधिक भीड़भाड़ वाले इलाके, जैसे कि रेलवे स्टेशन, मेट्रो, बाजार या किसी बड़े सार्वजनिक आयोजन के दौरान भी प्रीमियम यूजर्स को बिना किसी रुकावट के तेज स्पीड इंटरनेट मिलता रहेगा। इसके विपरीत, सामान्य या बजट प्लान का इस्तेमाल करने वाले ग्राहकों को नेटवर्क जाम और बेहद धीमी इंटरनेट स्पीड की समस्या से जूझना पड़ेगा।
भारत में शुरू हुआ वीआईपी इंटरनेट का दौर
इस वीआईपी इंटरनेट व्यवस्था की शुरुआत भारतीय बाजार में आधिकारिक तौर पर हो चुकी है। प्रमुख टेलीकॉम कंपनी एयरटेल ने अपनी प्रायोरिटी पोस्टपेड सेवा को बाजार में उतार दिया है, जिसके तहत महंगे प्लान लेने वाले ग्राहकों को भीड़भाड़ वाले क्षेत्रों में भी बेहतर नेटवर्क और तेज स्पीड की लिखित गारंटी दी जा रही है। वहीं दूसरी तरफ रिलायंस जियो भी अपने अत्याधुनिक 5G नेटवर्क पर इस प्रकार की प्रीमियम स्पीड-आधारित सेवाएं लागू करने के लिए पूरी तैयारी कर चुका है। वैश्विक स्तर पर देखें तो अमेरिका और यूरोप के कई देशों में यह स्पीड-आधारित चार्जिंग मॉडल पहले से ही काम कर रहा है, जहां उपभोक्ता डेटा लिमिट के बजाय इस बात के पैसे देते हैं कि उन्हें उनके डिवाइस पर इंटरनेट की रफ्तार कितनी चाहिए। भारतीय कंपनियां भी अब इसी अंतरराष्ट्रीय बिजनेस मॉडल को अपना रही हैं। कंपनियों का तर्क है कि अरबों रुपये के 5G निवेश की भरपाई के लिए अब डेटा की मात्रा के बजाय इंटरनेट की क्वालिटी और स्पीड के हिसाब से पैसे वसूलना ही एकमात्र रास्ता बचा है।
रेगुलेटरी अथॉरिटी का रुख और आम जनता के सामने बचे विकल्प
इस नई व्यवस्था ने देश में नेट न्यूट्रैलिटी यानी इंटरनेट की समानता को लेकर एक बहुत बड़ी कानूनी और नैतिक बहस छेड़ दी है। आलोचकों और जानकारों का मानना है कि इस कदम से समाज में एक नया डिजिटल फासला पैदा हो सकता है, जहां अमीर वर्ग को बेहतरीन इंटरनेट की सुविधा मिलेगी और कम बजट वाले आम नागरिकों को केवल धीमी इंटरनेट स्पीड से ही संतोष करना पड़ेगा। हालांकि, टेलीकॉम रेगुलेटरी अथॉरिटी ऑफ इंडिया यानी ट्राई के मौजूदा नियमों के मुताबिक, जब तक कंपनियां किसी खास ऐप या वेबसाइट के साथ भेदभाव नहीं करतीं, तब तक पूरे नेटवर्क की ओवरऑल स्पीड के आधार पर अलग-अलग प्लान बेचना नियमों का उल्लंघन नहीं माना जाएगा। इस चौतरफा महंगाई के दौर में अब आम उपभोक्ताओं के पास बहुत सीमित विकल्प बचे हैं। इस स्थिति में कई उपभोक्ता या तो सरकारी कंपनी बीएसएनएल की तरफ रुख कर रहे हैं जो फिलहाल अपने प्लान्स में इतनी बड़ी बढ़ोतरी नहीं कर रही है, या फिर लोग अपने घरों में फिक्स्ड ब्रॉडबैंड वाई-फाई लगवा रहे हैं जो मोबाइल डेटा के मुकाबले असीमित उपयोग के लिए ज्यादा किफायती साबित हो रहा है। कुल मिलाकर, आने वाले दिनों में डिजिटल इंडिया का सफर काफी महंगा होने वाला है।




