भोंपूराम खबरी, रुद्रपुर। भाजपा सरकार के परिवहन मंत्री व बाजपुर से विधायक यशपाल आर्य और उनके पुत्र व नैनीताल से विधायक संजीव आर्य की कांग्रेस में वापसी ने तराई सहित कुमाऊं की राजनीति को यकायक गर्म कर दिया है। बीते कई वर्षों से कांग्रेस के लोगों को अपनी पार्टी में शामिल कराकर कांग्रेस को झटका देने वाली भाजपा के लिए आर्य पिता-पुत्र का दल बदलना जोरदार झटका माना जा रहा है। कभी कांग्रेस का सबसे बड़े दलित चेहरा रहे यशपाल आर्य की कांग्रेस में वापसी से कयास लगाए जा रहे हैं कि आने वाले विधासभा चुनाव में भाजपा की राह कठिन होने वाली है।
अपनी राजनीति की शुरुआत कांग्रेस से करने वाले यशपाल आर्य कांग्रेस में रहते हुए न सिर्फ पांच बार विधायक बने बल्कि सात साल विधानसभा के स्पीकर भी रहे। यही नहीं वह कांग्रेस के पास सबसे बड़ा दलित चेहरा रहते हुए दो बार कांग्रेस के प्रदेशाध्यक्ष भी बने। साल 2012 की विधानसभा जीत कांग्रेस को उनके अध्यक्ष कार्यकाल में ही मिली थी। उस समय वह मुख्यमंत्री पद के दावेदार थे। लेकिन हाईकमान ने ऐन मौके पर विजय बहुगुणा को मुख्यमंत्री बना दिया। इसके बाद विजय बहुगुणा के हटने पर फिर से यशपाल आर्य का नाम उछला लेकिन केंद्र से हरीश रावत को मुख्यमंत्री बनाकर भेजा गया। कद्दावर नेता यशपाल आर्य और हरीश रावत के बीच की तल्खियां इसके बाद जगजाहिर होने लगी। हालांकि उन्हें परिवहन सहित भारी भरकम पोर्टफोलियो दिया गया लेकिन अक्सर अपनी नाराजगी जाहिर करने के लिए यशपाल जाने जाते रहे। साल 2016 में प्रदेश में आये राजनीतिक संकट के दौरान यशपाल ने भी कांग्रेस का दशकों का साथ छोड़कर भाजपा का दामन थाम लिया। भाजपा से हुए समझौते के तहत उन्हें व उनके पुत्र संजीव दोनों को विधानसभा चुनाव का टिकट मिला और दोनों ने जीत दर्ज की।
लेकिन कांग्रेस के विपरीत भाजपा जो कि संगठन की राजनीति के लिए जानी जाती है वहां यशपाल खुलकर बैटिंग नहीं कर पाए। साढ़े चार साल से भी अधिक के मंत्रित्वकाल में यशपाल मात्र अपनी विधानसभा बाजपुर तक सीमित रहे। जनपद में इस बात की भी चर्चा आम रही कि भाजपा के दूसरे कद्दावर मंत्री अरविन्द पाण्डेय के साथ छत्तीस का आंकड़ा यशपाल के आगे बढ़ने में बाधक रहा। वहीं भाजपा में उनके कार्यकाल के दौरान कभी भी उनकी नाराजगी की कोई सूचना नहीं आई जबकि कांग्रेस में रहते हुए आये दिन नाराज होना यशपाल आर्य का शगल था।
वहीं इसी साल कांग्रेस की मजबूत नेत्री इंदिरा हृदयेश के अवसान के बाद कांग्रेस में कभी उनके साथी रहे यशपाल आर्य को अपनी पार्टी में वापसी का यह सही समय लगा। डॉ हृदयेश के निधन के बाद कांग्रेस के लिए कुमाऊँ में सबसे बड़े नेता के रूप में वर्तमान प्रदेश कार्यकारी अध्यक्ष तिलक राज बेहड़ ही बचे थे जो पंजाबी समुदाय से आते हैं। ऐसे में पहाड़ी मूल और दलित वर्ग से ताल्लुक रखने वाले आर्य के लिए यह बेहतरीन मौका था जिसे उन्होंने लपक लिया। अब देखना यह होगा कि यशपाल कांग्रेस में भाजपा के तेवरों के साथ आते हैं या फिर यहाँ पूर्व की तरह कोप भवन की राजनीति करते हैं।वही दिल्ली में वरिष्ठ कांग्रेसी नेत्री शिल्पी अरोरा ने आर्य पुत्र को बधाई दी।

यशपाल आर्य की कांग्रेस में वापसी के बाद यह संभावना बन गई है कि यशपाल आर्य की करीबी जिला पंचायत अध्यक्ष समेत कई नेता भाजपा को बाय कर सकते हैं। बता दें कि तत्कालीन जिला पंचायत अध्यक्ष ईश्वरी प्रसाद गंगवार और सुरेश गंगवार को आर्य ने ही भाजपा में शामिल कराया था। अब सुरेश गंगवार की पत्नी रेनू गंगवार जिला पंचायत की अध्यक्ष हैं। सूत्रों की माने तो जिला पंचायत अध्यक्ष होने के बावजूद जिले के अधिकारी उन्हें खास तवज्जो नहीं दे रहे हैं। दो घटनाक्रम ऐसे हैं जिनमें उन्हें मुंह की खानी पड़ी। पहला एसएसपी का बोर्ड की बैठक से दो मिनट में उठ कर चले जाना और दूसरा पूरा जिला पंचायत के सदस्यों के कलेक्ट्रेट पर धरने के बाद भी डीएम का धरना स्थल पर न आना। इसके अलावा आवास विकास परिषद् के अध्यक्ष उपेन्द्र चौधरी जो कांग्रेस छोड़कर आर्य के साथ ही भाजपा में गए थे उनका भी कांग्रेस में वापसी करना तय माना जा रहा है। आने वाले दिनों में उधम सिंह नगर और हल्द्वानी से अच्छी खासी संख्या में आर्य समर्थक कांग्रेस में शामिल हो सकते हैं।




