भोंपूराम खबरी,पंतनगर । प्रदेश में 2.80 लाख हेक्टेयर भूमि में प्रतिवर्ष लगभग 5.5 लाख टन धान का उत्पादन होता है। राज्य के 13 जनपदों में धान के कुल क्षेत्रफल का 33 प्रतिशत केवल ऊधमसिंह नगर में है। वहीं पादप परजीवी सूत्रकृमि 11 से 73 प्रतिशत धान उत्पादन प्रभावित कर रहे हैं।
“जीबी पंत कृषि विवि के सूत्रकृमि विशेषज्ञ डॉ. सत्य कुमार ने बताया कि धान की फसल पर आक्रमण करने वाले कीटों व रोगों की तरह पादप परजीवी सूत्रकृमियों के आक्रमण से उत्पादन में कमी आ रही है। धान की फसल पर लगभग दो सौ प्रकार के सूत्रकृमियों का आक्रमण होता है जिनमें से धान का जड़गांठ सूत्रकृमि (मिलोइडोगाइन ग्रेविनीकोला), जड़ सूत्रकृमि हिर्शमनिल्ला ओराइजी), श्वेत शिरा सूत्रकृमि (डिटायलेंकस प्रजाति), धान का पुटिका सूत्रकृमि (हेटेरोडेरा प्रजाति) और धान का विक्षत सूत्रकृमि (प्राटायलेंग्स प्रजाति) प्रमुख हैं।
देश में पादप परजीवी सूत्रकृमि 11-73 प्रतिशत तक धान के उत्पादन में गिरावट ला सकते हैं जबकि जड़गांठ सूत्रकृमि ही धान उत्पादन को 16 प्रतिशत तक हानि पहुंचाता है। उत्तराखंड में खेतों की मिट्टी में धान के जड़गांठ सूत्रकृमि और जड़ सूत्रकृमि बहुतायत में हैं। डॉ. कुमार ने बताया वर्ष 2021- 23 तक देहरादून, हरिद्वार व ऊधमसिंह नगर सहित छह जिलों से धान के खेतों से मिट्टी के नमूने लेकर पंत विवि की सूत्रकृमि प्रयोगशाला की जांच से पता चला कि ऊंचाई वाले खेत में जड़गांठ सूत्रकृमि और तराई भावर क्षेत्र में धान का जड़ सूत्रकृमि फसल पर आक्रमण कर रहा है।
जड़गांठ सूत्रकृमि से संक्रमित धान के पौधों में पोषक तत्वों व जल का अभाव होता है। ऐसे पौधों में बौनापन, पत्तियां पीली व आकार में छोटी, पेड़ों में कल्लों का कम बनना व पेड़ों में बालियां कम एवं आकार में छेटा होना आदि पौधे के वायुवीय भागों में लक्षण पाए जाते हैं क्योंकि यह सूत्रकृमि जड़ में मौजूद अंतः परजीवी सूत्रकृमि हैं। तराई भाबर क्षेत्र में बहुतायत में पाया जाने वाला दूसरा सूत्रकृमि धान का जड़ सूत्रकृमि है। जो वल्कुट एवं पैरन्काइमा ऊतकों की कोशिकाओं में घूमते हुए कोशिका द्रव्य चूसता है जिससे जड़ों में श्रृंखला बनने से सड़न उत्पन्न हो जाती है। जड़ें भूमि से पर्याप्त जल व पोषक तत्वों को अवशोषित नहीं कर पाती हैं।
आखिर क्या हैं सूत्रकृमि
पंतनगर । सूत्रकृमि एक त्रिस्तरीय द्विपाश्र्व सममित, खंडहीन कूटगुहिका व अकशेरुकी जीव है। जिनके अंदर चार मुख्य अधिचर्म रज्जु त्रिआरीय ग्रसनी परिग्रसनीय तंत्रिका चक्र होता है और श्वसन व परिसंचरण क्रिया के लिए कोई विशेष अंग नहीं होता। गर्मी के मौसम (मई-जून) में खेतों की 15-15 दिनों के अंतर में गहरी जुताई करें जिससे धान की जड़ों में सुषुप्तावस्था में पड़े सूत्रकृमियों के अंडे, डिंबक व वयस्क गर्मी के कारण मर जाएंगे। आलू, मूंगफली व जूट जैसी फसलों को धान के फसल चक्र में समाहित करने से मृदा में सूत्रकृमि के निवेश द्रव्य में कमी की जा सकती है। धान की पौध में कार्बोफ्यूरान सूत्रकृमिनाशी दवा की 1-2 किग्रा. मात्रा प्रति हेक्टेयर की दर से प्रयोग करनी चाहिए।




