Saturday, September 5, 2026

चैत्र नवरात्रि का छठे दिन पढ़ें मां कात्यायनी की ये व्रत कथा, हो सकती है मनोकामना पूर्ण

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भोंपूराम खबरी। आज चैत्र नवरात्रि के छठे दिन मां दुर्गा के नौ स्वरूपों में से छठी मां कात्यायनी की पूजा करने का विधान है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मां कात्यायनी की आराधना करने से जातक को धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की प्राप्ति हो सकती हैं। इसके साथ ही जीवन में चली आ रही परेशानियों से निजात मिल सकती हैं और हर मनोकामना पूर्ण हो सकती है। मां कात्यायनी की पूजा विधि पूर्वक करने के साथ-साथ उनकी व्रत कथा का पाठ करना भी अत्यंत शुभ और फलदायी माना जाता है। आइए जानते हैं मां कात्यायनी की संपूर्ण व्रत कथा…

देवी भगवती पुराण के अनुसार, मां कात्यायनी का स्वरूप अत्यंत तेजस्वी और दिव्य माना गया है। उनकी चार भुजाएं हैं। बाईं ओर की ऊपरी भुजा में वे तलवार धारण करती हैं और नीचे की भुजा में कमल का पुष्प सुशोभित होता है। दाईं ओर की ऊपरी भुजा अभय मुद्रा में रहती है, जिससे वे भक्तों को निर्भयता का आशीर्वाद देती हैं, जबकि नीचे की दाहिनी भुजा वर मुद्रा में होती है, जो भक्तों की सभी मनोकामनाओं को पूर्ण करने का संकेत देती है।

मां कात्यायनी व्रत कथा (Maa Katyayani Vrat Katha)

पौराणिक कथा के अनुसार, कात्य गोत्र में जन्मे विश्व प्रसिद्ध महर्षि कात्यायन ने मां भगवती पराम्बा की कठिन तपस्या की। उनका हृदय इस संकल्प से भरा हुआ था कि देवी उन्हें पुत्री स्वरूप में प्राप्त हों। उनकी गहन साधना और अटूट भक्ति से प्रसन्न होकर मां भगवती ने उनके घर में पुत्री के रूप में अवतार लिया। इसी कारण यह देवी कात्यायनी के नाम से प्रसिद्ध हुईं।

मां कात्यायनी का गुण शोध और अनुसंधान कार्य है। इसी वजह से आधुनिक वैज्ञानिक युग में भी इनका महत्व अत्यंत बढ़ जाता है। इन्हीं की कृपा से जटिल से जटिल कार्य सफलतापूर्वक संपन्न होते हैं। मान्यता है कि ये वैद्यनाथ नामक स्थान पर प्रकट होकर पूजी गईं और तभी से संसार इन्हें अमोघ फलदायिनी के रूप में जानता है।

पौराणिक कथा के अनुसार, ब्रज की गोपियों ने भगवान श्रीकृष्ण को पति रूप में पाने की मनोकामना से मां कात्यायनी की विशेष पूजा की थी। यह पूजा कालिंदी यमुना के तट पर किया गया था। तभी से मां कात्यायनी को ब्रजमंडल की अधिष्ठात्री देवी माना जाता है।

इनका स्वरूप अत्यंत भव्य और दिव्य है। ये स्वर्ण के समान देदीप्यमान और प्रकाशमान हैं। मां की चार भुजाएं हैं दाहिनी ओर का ऊपर का हाथ अभय मुद्रा में है जो निर्भयता और सुरक्षा का प्रतीक है, नीचे का दाहिना हाथ वर मुद्रा में है जो कृपा और आशीर्वाद प्रदान करता है। बाईं ओर के ऊपर वाले हाथ में तलवार धारण किए हुए हैं, जबकि नीचे वाले हाथ में कमल का पुष्प सुशोभित है। मां का वाहन सिंह है, जो शक्ति और साहस का प्रतीक है।

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