Friday, September 4, 2026

सरकार की उदासीनता का महिलाओं को खामियाजा भुगतना पड़ रहा, गणेश उपाध्याय

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भोंपूराम खबरी। डॉ गणेश उपाध्याय जब कुमाऊं विश्वविद्यालय छात्रसंघ अध्यक्ष थे, उस दौरान उत्तर प्रदेश थे। उधम सिंह नगर ,नैनीताल जिले का भाग था हुआ करता था। उस दौरान जब छात्रों को कुमाऊं विश्वविद्यालय व अन्य डिग्री कॉलेज में एडमिशन के दौरान 27% ओबीसी लागू करने की बात की गई तो ,बहुत ही अच्छे छात्र छात्राएं जिनकी 60% से अधिक अंको से पास हुए थे, वे अपने पेरेंट्स के सामने रो रहे थे कि हमारा एडमिशन नहीं हो पा रहा है ।तो उस दौरान हमारे इस पर्वती क्षेत्र मात्र 2.4 % ओबीसी के लोग निवास करते थे। जिसकी लड़ाई कुमाऊं विश्वविद्यालय तत्कालीन छात्रसंघ अध्यक्ष डॉ गणेश उपाध्याय शहीद तत्काल में छात्र नेताओं ने संभाली थी। जो पूरे कुमाऊं ही नहीं पूरे गढ़वाल में भी आग की तरह फैल गई। जब कुमाऊं विश्वविद्याल सहित अन्य डिग्री कॉलेजो में एडमिशन के दौरान ओबीसी की सीटें खाली पड़ रही थी, लेकिन अच्छे छात्र छात्रों का एडमिशन नहीं हो पा रहा था ।आंदोलन से तेजी से चल रहा था, तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव सिंह ने स्पष्ट कर दिया कि हमे इस पर्वतीय राज्य से कोई लेना देना नहीं है। उस दौरान सभी पर्वतीय राज्य के छात्र छात्राओं सहित पर्वती क्षेत्र के कर्मचारी, महिलाओं, पूर्व सैनिक सहित सभी जनमानस का इस आंदोलन में सक्रिय योगदान दिया था। यहां के लोगों ने मुलायम सिंह का पुतला फूकना प्रारंभ कर दिया और संकल्प लिया कि अब हम अपने अलग राज्य बनाएंगे और आरक्षण खुद हमारे चुनी हुई सरकार तय करेगी । आज ही के दिन 2 अक्टूबर 1994 को लाल किले के मैदान मे करीब लगभग 10 लाख लोगों की रैली पूरे देश के अंदर जितने पहाड़ के लोग जहां जहां निवास करते थे, सब एकत्रित हुए ।काश यह रैली अगर सफल हुई होती, इस उत्तराखंड का राज्य का नेतृत्व तत्कालीन छात्र नेता कर रहे होते। डॉ गणेश उपाध्याय के नेतृत्व में ही तत्कालीन गृह राज्य मंत्री राजेश पायलट से वार्ता का निमंत्रण मिला ,वार्ता की गई है ।तब से उत्तराखंड राज्य का निर्माण का रास्ता अग्रसर हुआ । इस वार्ता के लिए सहयोग पूर्व मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी व पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत जी का सराहनीय योगदान रहा था। राज्य के निर्माण में पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेई जी का भी सराहनीय सहयोग रहा है ,जिसे उत्तराखंड की जमानत नहीं भूल सकती। लेकिन अभी भी उत्तराखंड आंदोलनकारी सब दुखी इस बात से है , 1994 के मुजफ्फरनगर तिहारे कांड , जो 2 अक्टूबर की रैली में दिल्ली लाल किले में जा रहे थे ।जो अनैतिक व गोली से जिन्हें भून दिया गया उन्हें अभी तक दंडित न करना केवल सरकारों के चेहरे को बेनकाब करता है ।पहले जो उत्तराखंड की महिलाओं को 30% आरक्षण 2006से मिलता आ रहा था ,सरकार की उदासीनता के वजह से हाईकोर्ट में सही पैरवी नहीं करने की वजह से उत्तराखंड की महिलाओं को खामियाजा भुगतना पड़ रहा है। और 10% क्षितिज आरक्षण जो आंदोलनकारियों को मिलता था, सरकार की उदासीनता की वजह।से हाईकोर्ट मे सही प्रकार के पैरवी नहीं करने की वजह से भुगतना पड़ रहा है।

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