भोंपूराम खबरी। देहरादून स्थित वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान के एक अध्ययन के अनुसार बीते पांच दशक में जो भूकंप दर्ज किए गए हैं उनसे सिर्फ 5 प्रतिशत ऊर्जा ही बाहर निकल सकी है। 95 प्रतिशत ऊर्जा भूगर्भ में ही जमा हो रही है। यूं तो समूचा हिमालयी क्षेत्र भूकंप के लिहाज से संवेदनशील है, लेकिन पिछले कुछ दिनों से निरंतर अंतराल में आ रहे भूकंप चिंता बढ़ाने वाले दिख रहे हैं।नौ नवंबर को नेपाल में आए 6.3 मैग्नीट्यूट के भूकंप के बाद शनिवार को भी नेपाल में आए 5.5 मैग्नीट्यूट का भूकंप देहरादून समेत उत्तराखंड के विभिन्न हिस्सों में महसूस किया गया।
भूकंप को रोका नहीं जा सकता है, लेकिन इसके प्रभाव को कम करने के लिए सुरक्षित निर्माण की तरफ बढ़ा जा सकता है। क्योंकि, वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान के एक अध्ययन पर गौर करें तो बीते पांच दशक में जो भूकंप रिकार्ड किए गए हैं, उनसे सिर्फ पांच प्रतिशत ऊर्जा ही बाहर निकल सकी है। वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान ने वर्ष 1968 से 2018 के बीच 426 भूकंप रिकार्ड किए। इनमें किन्नौर में वर्ष 1991 में आए 6.8, उत्तरकाशी के वर्ष 1991 के 6.4 व चमोली के वर्ष 1999 के 6.6 मैग्नीट्यूट के भूकंप का भी अध्ययन किया गया।
अध्ययन में पता चला कि 426 भूकंपों के रूप में इंडियन प्लेट के मूवमेंट करने से जमा हो रही ऊर्जा का तीन से पांच प्रतिशत हिस्सा ही बाहर निकल पा रहा है। ऐसे में हिमालयी क्षेत्र में आठ या इससे अधिक मैग्नीट्यूट के भूकंप की आशंका हमेशा बनी हुई है। नेपाल में नौ नवंबर को आए 6.3 मैग्नीट्यूट के भूकंप के बाद इसी क्षेत्र शनिवार रात को 5.5 मैग्नीट्यूट का भूकंप रिकार्ड किया गया। वहीं, शनिवार शाम को पौड़ी में 3.5 मैग्नीट्यूट का भूकंप आया।
शनिवार समेत हाल में आए भूकंप हिमालय निर्माण के समय अस्तित्व में आए मेन बाउंड्री थ्रस्ट (एमबीटी) व मेन सेंट्रल थ्रस्ट (एमसीटी) के बीच आ रहे हैं। इससे यह पता चलता है कि इन फाल्ट जोन में भूगर्भीय हलचल चल रही है। हालांकि, हिमालय के ही ऐतिहासिक फाल्ट हिमालयन फ्रंटल थ्रस्ट में अभी इस तरह की निरंतर हलचल देखने को नहीं मिल रही। बरिष्ठ विज्ञान डा अजय पाल के मुताबिक समूचा हिमालय भूकंप के लिहाज सड़े संवेदनशील है। यहां निरंतर छूटे भूकंप आते हैं और इनसे भी भूकंपीय ऊर्जा बाहर आती रहती है। इसलिए सभी भवनों के निर्माण में भूकंपरोधी तकनीक का प्रयोग अनिवार्य रूप से किया जाना चाहिए।




