Friday, September 4, 2026

नवरात्रि का आज सातवां दिन, क्यों कहलाती हैं मां कालरात्रि ‘शुभंकरी’

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भोंपूराम खबरी। शारदीय नवरात्र का आज सातवां दिन है और आज मां दुर्गा के सातवें स्वरूप मां कालरात्रि की पूजा और अर्चना का विधान है। मां के इसी स्वरूप के कारण ही इनका नाम कालरात्रि पड़ा। क्योंकि इनका वर्ण अंधकार की भांति एकदम काला है। सप्तमी तिथि की पूजा सुबह में नवरात्रि में अन्य दिनों की तरह ही होती है लेकिन रात्रि में विशेष पूजन विधान के साथ मां कालरात्रि की पूजा की जाती है। माता का यह स्वरूप उपासकों को काल से भी बचाता है अर्थात उनकी अकाल मृत्यु नहीं होती। कालरात्रि साधक को ज्ञान देती हैं कि अपने क्रोध का उपयोग स्वयं की सफलता के लिए कैसे करना है। आइए जानते हैं मां कालरात्रि पूजा का महत्व।

बाल बिखरे हुए हैं और इनके गले में दिखाई देने वाली माला बिजली की भांति देदीप्यमान है। इन्हें तमाम आसुरिक शक्तियों का विनाश करने वाला बताया गया है। माता कालरात्रि की पूजा रात्रि के समय भी होती है और उसमें ‘ऊं ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चै ऊं कालरात्रि दैव्ये नम:।’ इस मंत्र का जप किया जाता है। यह कालरात्रि देवी का सिद्ध मंत्र है। आज रात इस मंत्र के जप से माता की कृपा पा सकते हैं। पौराणिक कथा है कि शुंभ-निशुंभ और उसकी सेना को देखकर मां दुर्गा को भयंकर क्रोध आ गया था और क्रोध की वजह से मां का वर्ण श्यामल हो गया था। इसी श्यामल स्वरूप से देवी कालरात्रि का प्राकट्य हुआ। मां का यह स्वरूप भक्तों के लिए ममतामयी होने है, इस वजह से माता को शुभंकरी भी कहा गया है।

नकारात्मक शक्तियों को दूर करती हैं मां कालरात्रि 

कालरात्रि माता को सभी सिद्धियों की भी देवी कहा जाता है, इसीलिए सभी तंत्र मंत्र के उपासक इस दिन इनकी विशेष रूप से पूजा करते हैं। इनके नाम के उच्चारण मात्र से ही भूत, प्रेत, राक्षस, दानव और सभी पैशाचिक शक्तियां भाग जाती हैं। माना जाता है कि इस दिन इनकी पूजा करने वाले साधक का मन सहस्रार चक्र में स्थित होता है। इनकी पूजा में गुड़ के भोग का विशेष महत्व है। मां कालरात्रि की पूजा, अर्चना और स्तवन निम्न मंत्र से किया जाता है।

एकवेणी जपाकर्ण, पूरा नग्ना खरास्थिता।

लम्बोष्ठी कर्णिकाकर्णी, तैलाभ्यक्तशरीरिणी।

वामपादोल्लसल्लोह, लताकंटकभूषणा।

वर्धनमूर्धध्वजा कृष्णा, कालरात्रिभयंकरी।।

अर्थात एक वेणी (बालों की चोटी) वाली, जपाकुसुम (अड़हुल) के फूल की तरह लाल कर्ण वाली, उपासक की कामनाओं को पूर्ण करने वाली, गर्दभ पर सवारी करने वाली, लंबे होठों वाली, कर्णिका के फूलों की भांति कानों से युक्त, तैल से युक्त शरीर वाली, अपने बाएं पैर में चमकने वाली लौह लता धारण करने वाली, कांटों की तरह आभूषण पहनने वाली, बड़े ध्वज वाली और भयंकर लगने वाली कालरात्रि मां हमारी रक्षा करें।

ऐसा है मां कालरात्रि का स्वरूप

एक वेधी जपाकरर्णपूरा नग्ना खरास्थित।

लम्बोष्ठी कर्णिकाकणी तैलाभयुक्तशरीरिणी।।

वामपदोल्लसल्लोहलताकण्टक भूषणा।

वर्धनमूर्धध्वजा कृष्णा कालरात्रिर्भयंकारी।।

अपने महा विनाशक गुणों से शत्रुओं और दुष्टों का संहार करने वाली सातवीं दुर्गा का नाम कालरात्रि है। विनाशिका होने के कारण इनका नाम कालरात्रि पड़ा। आकृति और सांसरिक स्वरूप में यह कालिका का अवतार यानी काले रंग रूप और अपनी विशाल केश राशि को फैलाकर चार भुजाओं वाली दुर्गा हैं, जो वर्ण और वेश में अर्द्धनारीशवर शिव की तांडव मुद्रा में नजर आती हैं। इनकी आंखों से अग्नि की वर्षा होती है। एक हाथ में शत्रुओं की गर्दन पकड़कर और दूसरे हाथ में खड़क तलवार से युद्ध स्थल में उनका नाश करने वाली कालरात्रि अपने विकट रूप में नजर आती हैं। इनकी सवारी गर्दभ यानी गधा है, जो समस्त जीव जन्तुओं में सबसे ज्यादा परिश्रमी और निर्भय होकर अपनी अधिष्ठात्री देवी कालराात्रि को लेकर इस संसार में विचरण कर रहा है।

मां कालरात्रि पूजा विधि 

शारदीय नवरात्रि के सातवें दिन ब्रह्ममुहूर्त में उठकर स्नानादि से निवृत होकर साफ वस्त्र पहनें और माता का ध्यान करें। माता की पूजा भी अन्य दिनों की तरह होती हैं। मां कालरात्रि की पूजा शुरू करने से पहले उन्हें कुमकुम, लाल पुष्प और रोली लगाएं। इसके बाद माता को नींबुओं की माला और गुड़हल की फूल पहनाएं और फिर उनके आगे तेल का ही दीपक जलाएं। इस दिन मां को लाल फूल अर्पित करने का विधान है। साथ ही इस दिन माता की आरती के बाद सिद्ध कुंजिका स्तोत्र, काली पुराण, काली चालीसा, अर्गला स्तोत्रम, का पाठ करना चाहिए। माता को पूजा में गुड़ या गुड़ से बने व्यंजनों का भोग लगाना चाहिए।

मां कालरात्रि का मंत्र

जय त्वं देवि चामुण्डे जय भूतार्ति हारिणि।

जय सार्वगते देवि कालरात्रि नमोस्तुते॥

ॐ ऐं सर्वाप्रशमनं त्रैलोक्यस्या अखिलेश्वरी।

एवमेव त्वथा कार्यस्मद् वैरिविनाशनम् नमो सें ऐं ॐ।।

मां कालरात्रि आरती

कालरात्रि जय-जय-महाकाली।

काल के मुह से बचाने वाली॥

दुष्ट संघारक नाम तुम्हारा

।महाचंडी तेरा अवतार॥

पृथ्वी और आकाश पे सारा।

महाकाली है तेरा पसारा॥

खडग खप्पर रखने वाली।

दुष्टों का लहू चखने वाली॥

कलकत्ता स्थान तुम्हारा।

सब जगह देखूं तेरा नजारा॥

सभी देवता सब नर-नारी।

गावें स्तुति सभी तुम्हारी॥

रक्तदंता और अन्नपूर्णाकृपा करे तो कोई भी दुःख ना॥

ना कोई चिंता रहे बीमारी।

ना कोई गम ना संकट भारी॥

उस पर कभी कष्ट ना आवें।

महाकाली माँ जिसे बचाबे॥

तू भी भक्त प्रेम से कह।

कालरात्रि माँ तेरी जय॥

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

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