भोंपूराम खबरी, रुद्रपुर। उत्तराखंड में अपने शीर्ष नेताओं में वर्चस्व और अहम की लड़ाई के कारण अपनी राजनीतिक जमीन लगभग खो चुकी कांग्रेस पार्टी में सुधार होता नहीं दिख रहा है। प्रदेश नेतृत्व को लगा यह रोग अब पार्टी की जड़ों यानि नीचे के कार्यकर्ताओं में भी अपनी गहरी पैठ बना चुका है। यह हालत तब हैं जब बीते दो विधानसभा चुनाव में पार्टी को प्रदेश में करारी हार का सामना करना पड़ा है। ताज़ा मामला उधम सिंह नगर जिला मुख्यालय रुद्रपुर का है जहां पार्टी के जिलाध्यक्ष हिमांशु गावा के जन्मदिन पर शहर की सड़कों पर फ्लेक्सि बोर्ड लगाए गए और पार्टी के नेताओं की तस्वीरें भी समायोजित की गई। लेकिन इन बोर्ड में पाँच बार के विधायक और तराई के कद्दावर कांग्रेसी नेता तिलक राज बेहड़ की फोटो नदारद थी।

बात दें कि बीती 20 नवंबर को गावा के जन्मदिन के अवसर पर उनकी राइस मिल स्थित जिला कार्यालय पर कई केक काटे गए। अपने जिलाध्यक्ष को जन्मदिन की शुभकामनाएं देते कार्यकार्ताओं ने फ्लेक्सि बोर्ड से शहर के प्रमुख स्थानों को पाट दिया। इन बोर्ड में “बर्थडे बॉय” गावा सहित बधाई देने वाले नेता के साथ ही सोनिया गांधी, राहुल गांधी, हरीश रावत, आदि शीर्ष नेताओं के साथ ही उधम सिंह नगर जिले के कांग्रेसी विधायकों यशपाल आर्य, आदेश चौहान, भुवन कापड़ी, गोपाल सिंह राणा की भी तस्वीरें लगाई गई। लेकिन इनमें किच्छा से विधायक तिलक राज बेहड़ की तस्वीर गायब थी। “भोंपूराम खबरी” की टीम ने ऐसे कई बोर्ड की तस्वीरें अपने कैमरा में कैद की। जाहिर है कि बिना जिलाध्यक्ष गावा की सहमति के अपनी ही पार्टी के कद्दावर विधायक की फोटो बोर्ड से गायब करना आम कार्यकर्ता के बस की बात नहीं है।

ऐसा नहीं है कि गाव और बेहड़ के संबंध हमेशा से कडवे रहे हैं। एक दौर था जब गावा की सुबह बेहड़ के घर होती थी और बेहड़ अक्सर अपने कार्यक्रम गावा के घर रखते थे। लेकिन कालांतर में दोनों के बीच परस्पर दूरी बढ़ती चली गई। इसके घातक परिणाम पार्टी ने कई चुनाव में देखे। नगर निगम से लेकर विधायकी, कोआपरैटिव और क्षेत्र पंचायत सहित जिला पंचायत के अनगिनत चुनाव पार्टी रुद्रपुर में हारी। उधर बेहड़ ने भी अपने राजनीतिक भविष्य को सुरक्षित रखने के लिए किच्छा का रुख कर लिया और भाजपा के सिटिंग विधायक राजेश शुक्ला को हराकर पाँचवी बार विधायक बने। राजनीतिक व्यस्ततता के चलते उनकी रुद्रपुर से सहज दूरी बन गई लेकिन उनका निवास स्थान यही है और आज भी पार्टी की गतिविधियों का केंद्र है। बेहड़ की अनुपस्थिति में गावा राइस मिल अब मरणासन्न पार्टी की गतिविधियों का समानांतर केंद्र बन गई। पार्टी का प्रदेश नेतृत्व भी रुद्रपुर आगमन पर जिलाध्यक्ष गावा को ही अपना आशीर्वाद देता रहा है। यहाँ यह भी ध्यान देने योग्य है कि अपने बड़े कद और अहम के चलते बेहड़ भी प्रदेश के किसी भी समतुल्य या बड़े पदाधिकारी से झगड़ा मोल लेने में गुरेज नहीं करते हैं। तराई में किसी अन्य कांग्रेसी नेता की पैठ उन्हें पसंद नहीं आती है। जब प्रदेश में बहुगुणा और हरीश रावत सरकार रही तो पार्टी में नंबर दो रहने वाले यशपाल आर्या से उनका छत्तीस का आंकड़ा किसी से छुपा नहीं है।

वहीं गावा का ध्यान भी स्थानीय नेतृत्व के स्थान पर पार्टी के शीर्ष नेतृत्व को खुश रखने में ज्यादा रहता था। इसी पकड़ के चलते उन्होंने अपने चहेतों को पार्टी में मनमाफिक पद भी दिलवाए जिससे बेहड़ न सिर्फ नाराज हुए बल्कि उनकी गावा सहित पार्टी के अन्य बड़े नेताओं से भी दूरी बढ़ी। अलबत्ता अब वह विधायक हैं तो उनकी शक्तियां बढ़ी हैं। लेकिन पार्टी की अंदरूनी रार से वह अछूते नहीं रहेंगे यह तो तय है। उधम सिंह नगर के काँग्रेसियों का हाल यह है कि भले ही कोई भी अन्य दल जीत जाए लेकिन पार्टी के भीतर अपना प्रतिद्वंदी नहीं जीतना चाहिए। वैसे भी कांग्रेस में यह खासा प्रचलित है कि कांग्रेस ही कांग्रेस को हराती है। बीता विधानसभा और मेयर चुनाव इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है। इस रार को लेकर भले ही कांग्रेसी कुछ भी कहें लेकिन सच यह है कि काँग्रेस के भीतर की लड़ाई अब सड़कों पर दिख रही है और अभी तक प्रदेश के शीर्ष नेताओं के बीच खेला जाने वाला यह शह मात का खेल अब बहुत नीचे स्तर तक भी पहुँच चुका है। प्रदेश में सब कुछ गंवा चुके काँग्रेसियों का अहंकार अभी भी कम नहीं हो रहा है।

यह खेल भाजपा के लिए और मजेदार होने वाला है। चूंकि निकाय चुनाव सर पर हैं और आपस में लड़े भिड़े काँग्रेसियों ने एक दूसरे को हराने के लिए कमर कसने के साथ ही जमीन भी तैयार करनी शुरु कर दी है। भाजपा को रुद्रपुर नगर निगम थाल में सजकर मिलने वाला है। अलबत्ता अभी भी समय है और यदि बिल्लियों की लड़ाई में बंदर को लाभ मिलने की कहावत चरितार्थ नहीं होने देनी तो काँग्रेसियों को अपने झूठे और छद्दम आत्म सम्मान या यूं कहें कि अहंकार को छोड़ना ही होगा वरना परिणाम फिर वही हार के होंगे और उसके बाद कमरों में बैठकर राजनीति करने के।





